जीवन बीमा जीवन का बीमा नहीं होता
बहुत ही अजीब सा फतवा निकाला है उलेमाओं ने कल। मुसलमान अपने जीवन का बीमा नहीं करवा सकता। क्यों? क्योंकि जीवन तो खुदा का दिया है और खुदा जब चाहे उसे वापिस ले सकता है। इंसान कौन होता है अपने जीवन का बीमा करवाने वाला। अब इस तरह के फतवे निकलते रहे तो हमारे जैसे लोगों का काम धंधा चौपट ही समझो। तो हमने अपना फर्ज समझा कि सबसे पहले इस गलत फहमी को दूर किया जाये।
जीवन बीमा नाम हो जाने से जीवन का बीमा नहीं होता। दुनिया की कोई कंपनी किसी के जीवन का बीमा नहीं कर सकती। जब कोई कंपनी किसी व्यक्ति का बीमा करती है तो यह नही होता कि उसे कुछ हो जाये तो उस में फिर से जान डाल दी जायेगी।
जीवन बीमा केवल बीमित व्यक्ति की मृत्यू की अवस्था में उसकी आय से होने वाली हानि से परिवार को सुरक्षा प्रदान करता है। (A protection against the loss of income that would result if the insured passed away)। आज के दौर में जब शहरों में हर दूसरा व्यक्ति कर्ज लिये मकान में रहता है तो इस अवस्था में जीवन बीमा की अवश्यक्ता और भी बढ़ जाती है।
यूं तो बीमा कितना होना चाहिये यह हर व्यक्ति के अपने हालात पर निर्भर करता है फिर भी एक साधारण समीकरण के अनुसार आप एक वर्ष में जितना कमाते हैं उस का आठ गुना राशि निकाल लें। इस में आप अपनी तरल संपत्तियां (Liquid assets) जैसे नकदी, बैंक जमा और म्यूचव्ल फंड आदि को घटा दें और अपनी देनदारियां जैसे लोन, बच्चों की जिम्मेदारी, अन्य कोई जिम्मेदारी(जैसे छोटी बहन की शादी का खर्चा या घर का कोई अपंग सदस्य जो आप पर निर्भर हो) को इस में जोड़ लें। इस प्रकार जो राशि आयेगी उतनी राशि का बीमा आपको अवश्य लेना चाहिये। याद रहे कि मुद्रास्फीति का असर क्या होगा यह भी समायोजित(Adjust) कर लें। इसके लिये मेरा पिछला लेख क्या आप जल्द रिटायर्ड होना चाहते हैं देखें।
यदि आप चाहते हैं कि आप का परिवार किसी भी अनहोनी की अवस्था में इसी रहन सहन ( Living Standard ) को हमेशा के लिये कायम रख सके तो गिन कर देखिये आपको कितने बीमा की आवश्यक्ता है।







ऐसे फ़तवा निकालने वाले तो चूहों की तरह हैं, जो अपने बिलों में घुसे रहते हैं और दुनिया जहान की बातें नहीं समझना चाहते!
ये जो आपने जमा घटा आदी कर के समझाने की कोशीष की हैं क्या वह फतवा जारीकर्ताओं के पल्ले पड़ेगा. वे इतने ही समझदार होते तो वे, वे नहीं होते जे वे हैं.
ऐसे लोगो की अनसुनी करना ही इनका ईलाज हैं. देखना यह भी हैं की मुस्लिम समाज भी इनकी कितनी सुनता हैं.
संजय भाई, लेख का उद्देश्य आम आदमी को बीमा के बारे में जानकारी देना है। विषय को रुचिकर बनाने के लिये ताजा घटनाओं के साथ जोड़ने की कोशिश करता हूं जैसे पिछला लेख नारायनमूर्ती की रिटायरमैंट के साथ जोड़ दिया था।
एक मिसालः आप उस रासते पर जाएं तो गुनाह है - और उलमा लोग उसी रासते से जाएं तो जायज़ है - अब उलमा से पूछें कि आप भी तो उसी रासते से गुज़रे हैं - तो उन उलमा साहब का जवाब होगाः हां अलबत्ता उस रासते से तेज़ तेज़ चलना गुनाह है जबकि हम आहिसता आहिसता चले आए थे जो जायज़ है (हालांकि उस रासते से आना जाना गुना था)
उलमा लोग कुछ भी करलें जायज़ और आम मुस्लमान पर फतवे - यहां दुबई मे ऐसा ही है गरीब देशों के मुस्लमानों को इसलामी कानून के तहत सज़ा दी जाती है अमीर मुस्लमानों को ले दे कर छोड देते हैं - गरीब मुस्लमानों पर फत्वे यहां आम बात है।